विदेशी निवेश पर टैक्स बचाएं: टैक्स सलाहकार के साथ आसान फाइलिंग के गुप्त तरीके

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विदेश में निवेश का सपना कौन नहीं देखता, है ना? डॉलर, पाउंड या यूरो में कमाई, विदेशी बाजारों की चकाचौंध… ये सब सुनने में जितना लुभावना लगता है, उतना ही इसका एक दूसरा पहलू भी है – टैक्स का झंझट!

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सच कहूँ तो, मैंने खुद ऐसे कई लोगों को देखा है जो विदेश में अच्छी कमाई तो कर लेते हैं, लेकिन फिर भारत में उस पर टैक्स कैसे दें, सही टैक्स एडवाइजर कैसे ढूंढें, इस उलझन में फंस जाते हैं। आजकल डिजिटल युग में तो हर कोई विदेशी स्टॉक्स, म्यूचुअल फंड्स या क्रिप्टो में निवेश कर रहा है, पर क्या हम सभी इसके टैक्स नियमों से वाकिफ हैं?

सरकार के नियम हर साल बदलते रहते हैं, और विदेशी आय पर टैक्स भरना वाकई एक सिरदर्द बन सकता है, अगर सही जानकारी न हो तो। कई बार छोटी सी गलती भी बड़े जुर्माने का कारण बन जाती है।आज मैं आपके इसी सिरदर्द का इलाज लेकर आया हूँ, क्योंकि मैंने इस क्षेत्र में काफी अनुभव हासिल किया है और समझा है कि सही मार्गदर्शन कितना ज़रूरी है। इस विषय पर मुझे अक्सर ईमेल और मैसेजेस आते रहते हैं, इसलिए मुझे लगा कि क्यों न अपने सभी दोस्तों के साथ अपनी समझ साझा करूँ। यह सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि मेरा अपना अनुभव है जिसे मैं आपके साथ बाँटना चाहता हूँ ताकि आप भी बिना किसी परेशानी के अपने विदेशी निवेश का पूरा फायदा उठा सकें।नीचे दिए गए लेख में हम विदेशी निवेश पर टैक्स भरने के सारे गूढ़ रहस्यों को विस्तार से समझेंगे।

विदेश में कमाई, भारत में आयकर: यह गणित कैसे सुलझाएं?

विदेशी आय का मतलब क्या है?

दोस्तों, जब हम विदेश में निवेश या कमाई की बात करते हैं, तो अक्सर लोग सोचते हैं कि “विदेश की बात है, तो भारत को क्या पता चलेगा?” लेकिन ये आजकल की दुनिया में बहुत बड़ी गलतफहमी है!

सच कहूँ तो, जब भी आप भारत से बाहर कोई पैसा कमाते हैं, चाहे वह विदेशी स्टॉक में निवेश से मिला मुनाफा हो, किसी विदेशी कंपनी से मिला लाभांश हो, या फिर आप विदेश में रहकर कोई काम कर रहे हों, ये सब “विदेशी आय” मानी जाती है। मैंने खुद ऐसे कई दोस्त देखे हैं जो विदेश में छोटे-मोटे फ्रीलांस काम करके अच्छी रकम जुटा लेते हैं और सोचते हैं कि ये तो बस पॉकेट मनी है, इस पर कौन सा टैक्स देना होगा। पर दोस्तों, आयकर विभाग आजकल काफी स्मार्ट हो गया है और आपकी वित्तीय गतिविधियों पर पैनी नज़र रखता है। अगर आपकी निवासी स्थिति भारतीय है, तो आपकी वैश्विक आय पर भारत में टैक्स देना आपकी ज़िम्मेदारी है, और इसमें विदेशी आय भी शामिल है। यह जानना बेहद ज़रूरी है कि कौन सी आय विदेशी आय के दायरे में आती है ताकि आप किसी भी तरह की कानूनी झंझट से बच सकें। मुझे याद है, एक बार मेरे एक जानने वाले ने छोटी सी राशि विदेशी क्रिप्टो एक्सचेंज में लगा दी और जब मुनाफा हुआ, तो उन्हें लगा कि यह भारत के कानूनों से बाहर है। बाद में उन्हें पता चला कि वो गलत थे और उन्हें काफी परेशानी उठानी पड़ी।

भारत में टैक्स लायबिलिटी कैसे तय होती है?

अब सवाल आता है कि भारत में आपकी टैक्स लायबिलिटी कैसे तय होती है? यह पूरी तरह से आपकी “निवासी स्थिति” पर निर्भर करता है। हाँ, सही सुना आपने – ‘निवासी स्थिति’!

यह कोई साधारण चीज़ नहीं है, बल्कि आयकर अधिनियम, 1961 के तहत एक बहुत ही महत्वपूर्ण अवधारणा है। सरल शब्दों में, अगर आप एक वित्तीय वर्ष में भारत में 182 दिन या उससे ज़्यादा रहते हैं (कुछ अन्य शर्तों के साथ), तो आप “निवासी भारतीय” माने जाते हैं। और एक निवासी भारतीय के तौर पर, आपको अपनी पूरी दुनिया भर की आय पर भारत में टैक्स देना होता है। इसमें आपकी भारत में की गई कमाई के साथ-साथ विदेश में की गई कमाई भी शामिल है। वहीं, अगर आप अनिवासी भारतीय (NRI) हैं, तो नियम थोड़े अलग हो जाते हैं। NRI को केवल भारत में अर्जित या प्राप्त आय पर ही टैक्स देना होता है, विदेशी आय पर नहीं। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि आपकी निवासी स्थिति क्या है, क्योंकि इसी से तय होता है कि आप कितना टैक्स देंगे और किस आय पर देंगे। मैंने कई बार देखा है कि लोग इस बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं और बाद में उन्हें भारी पेनल्टी चुकानी पड़ती है। अपनी निवासी स्थिति को सही ढंग से समझना पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है, तभी आप अपने विदेशी निवेश पर टैक्स की सही प्लानिंग कर पाएंगे।

विदेशी निवेश के प्रकार और उन पर टैक्स के नियम

विदेशी स्टॉक और म्यूचुअल फंड पर टैक्स

आजकल तो हर कोई विदेशी स्टॉक्स में निवेश करके अच्छी कमाई करना चाहता है, है ना? अमेरिकी शेयर बाज़ार की चकाचौंध या यूरोपियन कंपनियों की स्थिरता, किसे आकर्षित नहीं करती!

मैंने खुद कुछ साल पहले विदेशी स्टॉक्स में हाथ आज़माया था और शुरुआत में मैं भी थोड़ा उलझन में था कि भारत में इस पर टैक्स कैसे लगेगा। दरअसल, जब आप विदेशी स्टॉक्स या म्यूचुअल फंड्स में निवेश करते हैं और उनसे मुनाफा कमाते हैं, तो उसे ‘कैपिटल गेन’ माना जाता है। अगर आप 24 महीने से ज़्यादा समय तक उन स्टॉक्स या फंड्स को होल्ड करते हैं, तो इसे ‘लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन’ (LTCG) कहते हैं, और इस पर 20% टैक्स लगता है, जिसमें इंडेक्सेशन बेनिफिट भी मिलता है। वहीं, अगर आप 24 महीने से कम समय में बेचते हैं, तो यह ‘शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन’ (STCG) होता है, और यह आपकी कुल आय में जुड़ जाता है, जिस पर आपके स्लैब रेट के अनुसार टैक्स लगता है। इसके अलावा, अगर आपको विदेशी स्टॉक्स से लाभांश मिलता है, तो वह ‘अन्य स्रोतों से आय’ के तहत आपकी कुल आय में जुड़ जाता है और आपके इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार उस पर टैक्स लगता है। मेरे एक दोस्त को टेस्ला के शेयरों से काफी लाभांश मिला था और उसे लगा कि यह तो विदेशी कंपनी है, तो भारत में इस पर टैक्स नहीं लगेगा। बाद में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने सही सलाह ली। इसलिए दोस्तों, यह जानना बेहद ज़रूरी है कि किस तरह के निवेश पर क्या टैक्स लगता है।

क्रिप्टोकरेंसी और विदेश में संपत्ति पर टैक्स

क्रिप्टोकरेंसी! आजकल हर जुबान पर यही नाम है। बिटकॉइन, इथेरियम… इन डिजिटल मुद्राओं ने कई लोगों को रातोंरात अमीर बनाया है, लेकिन इसके टैक्स नियमों को लेकर हमेशा एक असमंजस की स्थिति रहती है। भारत में क्रिप्टोकरेंसी को ‘वर्चुअल डिजिटल एसेट’ (VDA) के तौर पर देखा जाता है। अगर आप क्रिप्टोकरेंसी बेचकर मुनाफा कमाते हैं, तो उस पर 30% फ्लैट टैक्स लगता है, भले ही आपने उसे कितने भी समय तक होल्ड किया हो। इसमें आपको कोई डिडक्शन या सेट-ऑफ का लाभ नहीं मिलता। यही नहीं, अगर आप एक क्रिप्टो से दूसरे क्रिप्टो में बदलते हैं, तो उस पर भी टैक्स लगता है। यह थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन नियम ऐसे ही हैं। इसके अलावा, अगर आपके पास विदेश में कोई संपत्ति है, जैसे घर या ज़मीन, और आप उसे बेचते हैं, तो उस पर होने वाला मुनाफा भी भारत में टैक्सेबल होता है। ये भी कैपिटल गेन के नियमों के तहत ही आता है। मैंने खुद देखा है कि लोग अक्सर सोचते हैं कि क्रिप्टो पर टैक्स नहीं है क्योंकि यह ‘रेगुलेटेड’ नहीं है, पर ये बहुत बड़ी गलतफहमी है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि इस पर टैक्स लगेगा और आपको इसे अपनी आय में दिखाना होगा।

विदेशी कंपनियों से लाभांश और ब्याज

कई बार हम विदेशी कंपनियों के बॉन्ड्स या फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश करते हैं, या फिर विदेशी बैंकों में खाता खोलते हैं, और उन पर हमें ब्याज या लाभांश मिलता है। ये भी आपकी विदेशी आय का हिस्सा होता है। मेरे एक अंकल ने विदेश में एक एफडी करवाई थी और उन्हें अच्छा खासा ब्याज मिल रहा था। उन्हें लगा कि यह तो विदेश में है, तो भारत में इस पर कोई टैक्स नहीं देना होगा। लेकिन ऐसा नहीं है दोस्तों!

अगर आप भारतीय निवासी हैं, तो आपको इस ब्याज और लाभांश पर भारत में टैक्स देना होगा। यह आपकी ‘अन्य स्रोतों से आय’ के तहत आता है और आपके इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार इस पर टैक्स लगता है। यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि कई देशों के साथ भारत के ‘दोहरा कराधान बचाव समझौता’ (DTAA) हैं, जो आपको एक ही आय पर दो बार टैक्स देने से बचाते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपको टैक्स देना ही नहीं होगा, बल्कि इसका मतलब है कि आप एक जगह दिए गए टैक्स का क्रेडिट दूसरी जगह ले सकते हैं। इस टेबल पर एक नज़र डालिए, यह आपको विभिन्न प्रकार की विदेशी आय पर लगने वाले टैक्स की एक मोटी-मोटी जानकारी देगा:

विदेशी आय का प्रकार टैक्स उपचार (भारतीय निवासी के लिए) मुख्य बातें
विदेशी स्टॉक/म्यूचुअल फंड से कैपिटल गेन शॉर्ट टर्म: स्लैब रेट के अनुसार; लॉन्ग टर्म: 20% (इंडेक्सेशन के साथ) होल्डिंग पीरियड (24 महीने) महत्वपूर्ण है
विदेशी कंपनियों से लाभांश स्लैब रेट के अनुसार (अन्य स्रोतों से आय) DTAA के प्रावधान लागू हो सकते हैं
विदेशी बैंक से ब्याज स्लैब रेट के अनुसार (अन्य स्रोतों से आय) टैक्स क्रेडिट का दावा किया जा सकता है
क्रिप्टोकरेंसी से कैपिटल गेन 30% फ्लैट टैक्स कोई डिडक्शन या सेट-ऑफ नहीं
विदेशी संपत्ति की बिक्री से मुनाफा शॉर्ट टर्म: स्लैब रेट के अनुसार; लॉन्ग टर्म: 20% (इंडेक्सेशन के साथ) संपत्ति के प्रकार और होल्डिंग पीरियड पर निर्भर करता है
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NRI या भारतीय निवासी: टैक्स के खेल में क्या है आपका दर्जा?

निवासी स्थिति का महत्व

टैक्स के मामले में, आपकी “निवासी स्थिति” ही सब कुछ है, दोस्तों! यह आपकी जन्मभूमि, नागरिकता या पासपोर्ट से बिल्कुल अलग होती है। आयकर कानून में आपकी निवासी स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि आप एक वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल से 31 मार्च) में कितने दिन भारत में रहे हैं। यह एक बहुत ही तकनीकी लेकिन बेहद ज़रूरी पहलू है जिसे समझना हर विदेशी निवेशक के लिए अहम है। अगर आप एक वित्तीय वर्ष में 182 दिन या उससे ज़्यादा भारत में रहते हैं, तो आम तौर पर आप निवासी भारतीय माने जाते हैं। इसके अलावा भी कुछ और शर्तें हैं, जैसे पिछले चार वित्तीय वर्षों में कुल 365 दिन और वर्तमान वित्तीय वर्ष में 60 दिन। अगर आप इन शर्तों को पूरा करते हैं, तो चाहे आपने दुनिया के किसी भी कोने में पैसा कमाया हो, आपको उस पर भारत में टैक्स देना होगा। मैंने देखा है कि कई लोग बस अपने आधार कार्ड या पैन कार्ड को देखकर खुद को भारतीय निवासी मान लेते हैं, जबकि वे सालों से विदेश में रह रहे होते हैं। यह गलती बाद में बहुत महंगी पड़ सकती है। आपकी निवासी स्थिति ही आपकी टैक्स लायबिलिटी की नींव रखती है, इसलिए इसे सही से पहचानना बहुत ज़रूरी है।

अनिवासी भारतीय (NRI) के लिए विशेष नियम

अब बात करते हैं हमारे NRI दोस्तों की। अगर आप एक अनिवासी भारतीय हैं, यानी आपने निवासी स्थिति की शर्तों को पूरा नहीं किया है, तो आपके लिए नियम थोड़े अलग और शायद थोड़े आसान भी हो सकते हैं। एक NRI को केवल भारत में अर्जित या भारत से प्राप्त आय पर ही टैक्स देना होता है। इसका मतलब है कि अगर आपने विदेश में कोई कमाई की है, जैसे विदेशी स्टॉक्स से मुनाफा, या विदेश में नौकरी से मिली सैलरी, तो उस पर आपको भारत में टैक्स नहीं देना होगा। यह एक बड़ा फायदा है जो NRI को मिलता है। लेकिन, अगर आपकी भारत में कोई संपत्ति है और आप उसे बेचते हैं, या भारत में किसी बैंक में आपकी एफडी है और उस पर ब्याज मिलता है, तो उस पर आपको भारत में टैक्स देना होगा। इसलिए, NRI होने पर भी आपको अपनी भारत-संबंधित आय पर पूरा ध्यान देना होगा। मुझे याद है, एक बार मेरे एक रिश्तेदार, जो सालों से दुबई में रह रहे थे, उन्होंने भारत में एक पुरानी पुश्तैनी ज़मीन बेची। उन्हें लगा कि NRI होने के नाते उन्हें कोई टैक्स नहीं देना होगा, पर जब उन्होंने अपने आयकर सलाहकार से बात की, तो पता चला कि भारत में अर्जित आय पर उन्हें कैपिटल गेन टैक्स देना होगा। तो, NRI होने का मतलब यह नहीं है कि आप भारत में टैक्स से पूरी तरह मुक्त हैं, बल्कि आपको केवल अपनी विदेशी आय पर भारत में टैक्स नहीं देना होता है।

सही टैक्स सलाहकार की तलाश: क्यों यह इतना ज़रूरी है?

अनुभवी सलाहकार क्यों चुनें?

सच कहूँ तो, विदेशी निवेश और उसके टैक्स नियम इतने पेचीदा होते हैं कि एक आम आदमी के लिए इन्हें खुद समझना लगभग नामुमकिन है। मैंने खुद कई बार महसूस किया है कि जब बात पैसों और नियमों की आती है, तो एक विशेषज्ञ की सलाह कितनी मायने रखती है। एक अनुभवी टैक्स सलाहकार सिर्फ आपके फॉर्म भरने में मदद नहीं करता, बल्कि वह आपको भविष्य के लिए सही योजना बनाने में भी मदद करता है। वे आपको उन सभी बारीकियों के बारे में बता सकते हैं जिनकी जानकारी शायद आपको न हो, जैसे DTAA का सही इस्तेमाल कैसे करें, या किस निवेश पर आपको टैक्स क्रेडिट मिल सकता है। मेरे एक दोस्त ने एक बार विदेशी म्यूचुअल फंड में निवेश किया था और उसने सोचा कि वह खुद ही टैक्स भर लेगा। अंत में उसने गलत जानकारी दे दी और उसे आयकर विभाग से नोटिस आ गया। तब उसे एहसास हुआ कि सही सलाहकार की कितनी ज़रूरत है। एक अनुभवी सलाहकार आपको न केवल कानूनी झंझटों से बचाता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि आप कोई टैक्स छूट या लाभ न छोड़ दें जिसका आप हकदार हैं। वे नए-नए सरकारी नियमों और बदलावों से भी अपडेट रहते हैं, जो हमारे लिए खुद ट्रैक करना मुश्किल हो सकता है।

गलत सलाह से बचने के तरीके

आजकल तो हर दूसरा व्यक्ति ‘टैक्स एक्सपर्ट’ बना घूमता है, है ना? लेकिन दोस्तों, गलत सलाह आपको फायदे की जगह नुकसान ही पहुंचा सकती है। इसलिए, सही सलाहकार चुनना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सही निवेश चुनना। मैंने खुद कई बार देखा है कि लोग अपने दोस्तों या रिश्तेदारों की ‘फ्री सलाह’ पर भरोसा कर लेते हैं और बाद में पछताते हैं। एक अच्छे टैक्स सलाहकार को चुनने के लिए कुछ बातें ध्यान में रखनी बहुत ज़रूरी हैं। सबसे पहले, उनका अनुभव देखें, खासकर विदेशी आय और अंतर्राष्ट्रीय कराधान में। क्या उन्होंने पहले भी ऐसे मामलों को संभाला है?

दूसरा, उनकी योग्यता और प्रमाणन जांचें। क्या वे प्रमाणित चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) हैं? तीसरा, उनकी फीस के बारे में स्पष्ट बात करें ताकि बाद में कोई अप्रत्याशित खर्च न हो। और सबसे ज़रूरी बात, एक ऐसा सलाहकार चुनें जिस पर आप भरोसा कर सकें और जिसके साथ आप खुलकर अपनी वित्तीय स्थिति पर चर्चा कर सकें। मेरे एक परिचित ने एक बार एक ऐसे ‘सलाहकार’ से सलाह ले ली थी जिसने उन्हें ऐसे रास्ते बताए जो कानूनी रूप से सही नहीं थे। जब आयकर विभाग की जांच हुई, तो उन्हें बहुत परेशानी हुई। इसलिए, दोस्तों, हमेशा याद रखें – गुणवत्ता कभी भी सस्ती नहीं आती, खासकर जब बात आपके वित्तीय भविष्य की हो।

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विदेशी आय रिपोर्टिंग: भूल गए तो लगेगी भारी चपत!

सही फॉर्म और समय सीमा

दोस्तों, विदेश में कमाई करना एक बात है और उसे सही ढंग से सरकार को बताना दूसरी। अगर आप भारतीय निवासी हैं और आपकी कोई विदेशी आय या संपत्ति है, तो उसे आयकर रिटर्न में रिपोर्ट करना बेहद ज़रूरी है। यह कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक कानूनी बाध्यता है। मैंने देखा है कि कई लोग इस बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, खासकर जब बात छोटी-मोटी विदेशी आय की आती है। लेकिन याद रखें, छोटी सी गलती भी बाद में बड़ी मुश्किल पैदा कर सकती है। आपको अपनी विदेशी आय और संपत्ति की जानकारी ‘शेड्यूल एफए’ (Schedule FA) में देनी होती है, जो आपके आयकर रिटर्न फॉर्म (ITR) का एक हिस्सा होता है। यह शेड्यूल विदेशी बैंक खातों, विदेशी संपत्तियों, विदेशी संस्थाओं में शेयरों और अन्य विदेशी संपत्तियों की पूरी जानकारी मांगता है। अगर आपके पास ये जानकारी नहीं है, तो तुरंत अपने बैंक या ब्रोकर से संपर्क करें। आयकर रिटर्न दाखिल करने की सामान्य अंतिम तिथि 31 जुलाई होती है (कंपनियों और ऑडिट वाले व्यक्तियों के लिए 31 अक्टूबर)। इस समय सीमा को चूकने का मतलब है पेनल्टी और ब्याज का बोझ। इसलिए, दोस्तों, अपनी सभी विदेशी वित्तीय जानकारी को इकट्ठा करके समय पर रिटर्न भरना सुनिश्चित करें।

क्या होता है अगर आप रिपोर्ट नहीं करते?

अगर आप अपनी विदेशी आय या संपत्ति को रिपोर्ट करने से चूक जाते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। आयकर विभाग आजकल बहुत सक्रिय है और उसके पास विदेशों से सूचनाओं के आदान-प्रदान के कई समझौते हैं। इसका मतलब है कि अगर आपकी विदेशी वित्तीय जानकारी भारत में रिपोर्ट नहीं की गई है, तो उन्हें किसी न किसी माध्यम से पता चल सकता है। और जब उन्हें पता चलता है, तो फिर भारी जुर्माना लगता है। ‘काला धन (अघोषित विदेशी आय और संपत्ति) और कर अधिनियम, 2015’ जैसे कानून इसी के लिए बने हैं। इस कानून के तहत अघोषित विदेशी आय या संपत्ति पर 120% तक का जुर्माना लग सकता है, और कुछ मामलों में तो जेल की सज़ा भी हो सकती है। मेरे एक परिचित ने कुछ साल पहले एक विदेशी बैंक खाता खोल लिया था और उसे अपने आयकर रिटर्न में बताना भूल गया। जब आयकर विभाग ने उससे पूछताछ की, तो उसे बहुत डर लगा और उसे न केवल भारी जुर्माना भरना पड़ा बल्कि मानसिक परेशानी भी हुई। इसलिए दोस्तों, इस मामले में कोई जोखिम न लें। पारदर्शिता ही सबसे अच्छी नीति है। अपनी सभी विदेशी आय और संपत्तियों को पूरी ईमानदारी और समय पर रिपोर्ट करें ताकि आप चैन की नींद सो सकें।

डबल टैक्सेशन से कैसे बचें: समझदारी से करें योजना

DTAA (दोहरा कराधान बचाव समझौता) का उपयोग

यह एक ऐसी चीज़ है जो कई विदेशी निवेशकों को राहत की सांस देती है – DTAA, यानी दोहरा कराधान बचाव समझौता! सच कहूँ तो, यह एक वरदान है। यह समझौता भारत और विभिन्न देशों के बीच होता है ताकि आपको एक ही आय पर दो बार टैक्स न देना पड़े। मान लीजिए, आपने अमेरिका में कुछ कमाया और उस पर वहां टैक्स दिया, तो DTAA के तहत आप भारत में उस टैक्स का क्रेडिट ले सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि आपको टैक्स देना ही नहीं होगा, बल्कि इसका मतलब है कि आप एक जगह दिए गए टैक्स को दूसरी जगह एडजस्ट कर सकते हैं। यह समझना थोड़ा पेचीदा लग सकता है, लेकिन इसका फायदा बहुत बड़ा है। मैंने खुद देखा है कि कैसे मेरे कई दोस्त, जिन्हें विदेशों से पेंशन या लाभांश मिलता था, वे DTAA का लाभ उठाकर काफी टैक्स बचा पाए। लेकिन दोस्तों, DTAA के नियमों को समझना और उनका सही तरीके से पालन करना बहुत ज़रूरी है। हर देश के साथ अलग समझौता होता है और उसके नियम भी अलग-अलग होते हैं। इसलिए, अगर आप इस समझौते का लाभ उठाना चाहते हैं, तो एक अनुभवी टैक्स सलाहकार की मदद लेना सबसे अच्छा रहेगा।

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विदेशी टैक्स क्रेडिट का फायदा

DTAA का सबसे बड़ा लाभ ‘विदेशी टैक्स क्रेडिट’ के रूप में मिलता है। इसका मतलब है कि अगर आपने किसी विदेशी देश में अपनी आय पर टैक्स चुकाया है, तो आप उस टैक्स की राशि को भारत में अपनी टैक्स लायबिलिटी से घटा सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर आपने अमेरिका में $1000 का टैक्स दिया है, और भारत में आपकी उसी आय पर ₹80,000 की टैक्स लायबिलिटी बनती है, तो आप उस $1000 (भारतीय रुपये में परिवर्तित) के बराबर राशि का क्रेडिट ले सकते हैं। यह आपके लिए एक बड़ी बचत हो सकती है। लेकिन इस क्रेडिट का दावा करने के लिए आपको कुछ शर्तें पूरी करनी होती हैं, जैसे आपके पास विदेशी टैक्स भुगतान का सबूत होना चाहिए। आपको फॉर्म ITR-2 या ITR-3 में ‘शेड्यूल TR’ (Tax Relief) और ‘फॉर्म 67’ भरना होगा। मैंने देखा है कि कई लोग बस टैक्स भर देते हैं और इस क्रेडिट का दावा करना भूल जाते हैं, जिससे उन्हें नुकसान होता है। दोस्तों, यह आपका हक है और आपको इसका पूरा फायदा उठाना चाहिए। यह आपको एक ही कमाई पर दो बार टैक्स देने के झंझट से बचाता है और आपके विदेशी निवेश को और भी आकर्षक बनाता है।

विदेशी निवेश से जुड़े सामान्य मिथक और सच्चाई

मिथक 1: “मुझे पता नहीं चलेगा, तो टैक्स नहीं लगेगा।”

यह शायद सबसे आम और सबसे खतरनाक मिथक है जो मैंने विदेशी निवेशकों के बीच देखा है। लोग सोचते हैं कि अगर उन्होंने विदेश में कुछ कमाया है और उस पर भारत में टैक्स नहीं भरा, तो किसी को पता ही नहीं चलेगा। “समुंदर पार की बात है, भला कौन ढूंढने जाएगा!” – ऐसी सोच रखने वाले लोग अक्सर बाद में पछताते हैं। दोस्तों, यह डिजिटल युग है!

आज दुनिया इतनी जुड़ी हुई है कि कुछ भी छिपाना लगभग नामुमकिन है। भारत सरकार ने कई देशों के साथ टैक्स सूचना के आदान-प्रदान के समझौते (Automatic Exchange of Information – AEOI) किए हुए हैं। इसका मतलब है कि अगर आपका किसी विदेशी बैंक में खाता है, या आपने किसी विदेशी कंपनी में निवेश किया है, तो उस देश की सरकार भारतीय आयकर विभाग के साथ आपकी जानकारी साझा कर सकती है। मुझे याद है, मेरे एक दोस्त ने सोचा कि उसने विदेशी क्रिप्टो एक्सचेंज में निवेश किया है, तो वह भारतीय कानूनों की पहुंच से बाहर है। बाद में उसे पता चला कि आयकर विभाग के पास उसकी सारी जानकारी थी और उसे भारी पेनल्टी भरनी पड़ी। इसलिए, दोस्तों, यह सोचना छोड़ दें कि आपकी विदेशी वित्तीय गतिविधियां किसी की नज़र में नहीं आएंगी। पारदर्शिता ही एकमात्र सुरक्षित रास्ता है।

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मिथक 2: “सिर्फ बड़े निवेशक ही फंसते हैं।”

एक और बड़ी गलतफहमी यह है कि केवल वही लोग मुश्किल में पड़ते हैं जिनकी विदेशी आय बहुत ज़्यादा होती है। कई लोग सोचते हैं कि अगर उनकी विदेशी कमाई या निवेश की राशि छोटी है, तो आयकर विभाग उन्हें नज़रअंदाज़ कर देगा। “छोटी रकम पर कौन माथापच्ची करेगा?” – यह भी एक ऐसा विचार है जो आपको मुसीबत में डाल सकता है। मैंने देखा है कि आयकर विभाग अब छोटी से छोटी विदेशी लेनदेन पर भी ध्यान दे रहा है। सीमा चाहे कितनी भी हो, अगर आपकी कोई विदेशी आय या संपत्ति है जिसे रिपोर्ट करना ज़रूरी है, तो आपको उसे रिपोर्ट करना ही होगा। विभाग का ध्यान सिर्फ बड़ी मछलियों पर नहीं, बल्कि उन सभी पर है जो नियमों का पालन नहीं करते। मेरा एक पड़ोसी था जिसने कुछ हज़ार डॉलर के विदेशी स्टॉक खरीदे थे। उसने सोचा कि यह इतनी छोटी रकम है कि इसे रिपोर्ट करने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन जब आयकर विभाग ने उससे इस बारे में सवाल किया, तो उसे एहसास हुआ कि उसने कितनी बड़ी गलती कर दी थी। इसलिए, दोस्तों, चाहे आपकी विदेशी आय छोटी हो या बड़ी, नियमों का पालन करना सभी के लिए अनिवार्य है। लापरवाही आपको भारी पड़ सकती है।

글 को समाप्त करते हुए

तो दोस्तों, जैसा कि आपने देखा, विदेश में कमाई करना और उस पर भारत में टैक्स चुकाना एक कला है जिसमें थोड़ी सी भी लापरवाही आपको बड़ी मुश्किल में डाल सकती है। मेरा हमेशा से यही मानना रहा है कि जानकारी ही सबसे बड़ी ताकत है, खासकर जब बात आपके पैसों की हो। मैंने खुद अपने अनुभवों से यह सीखा है कि समय पर सही जानकारी और सही योजना आपको न केवल कानूनी झंझटों से बचाती है, बल्कि आपको मानसिक शांति भी देती है। अपनी मेहनत की कमाई को सही तरीके से मैनेज करना और सरकार के नियमों का पालन करना हम सबका कर्तव्य है। याद रखिए, यह सिर्फ टैक्स भरने की बात नहीं है, बल्कि आपके वित्तीय भविष्य को सुरक्षित रखने का सवाल है।

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알아두면 쓸모 있는 정보

1. अपनी निवासी स्थिति (Resident Status) को हर साल जांचें, क्योंकि इसी से आपकी वैश्विक आय पर टैक्स की जवाबदेही तय होती है। एक छोटे से बदलाव से भी आपके टैक्स नियम बदल सकते हैं।

2. विदेशी निवेश या आय पर मिलने वाले लाभांश (Dividend) और ब्याज (Interest) को अपनी भारतीय आय के साथ जोड़कर अपनी टैक्स स्लैब के अनुसार रिपोर्ट करना न भूलें।

3. अगर आपने किसी विदेशी देश में टैक्स चुकाया है, तो दोहरा कराधान बचाव समझौता (DTAA) के तहत भारत में उसका क्रेडिट लेने का दावा ज़रूर करें। इससे आप एक ही आय पर दो बार टैक्स देने से बच जाएंगे।

4. क्रिप्टोकरेंसी में निवेश करने वालों को यह याद रखना चाहिए कि इस पर 30% फ्लैट टैक्स लगता है और इसमें किसी भी तरह के डिडक्शन या सेट-ऑफ की सुविधा नहीं मिलती है।

5. अपनी सभी विदेशी संपत्तियों और आय को आयकर रिटर्न के ‘शेड्यूल एफए’ (Schedule FA) में समय पर रिपोर्ट करना अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

महत्वपूर्ण बातों का सार

संक्षेप में, विदेशी आय और निवेश पर टैक्स का गणित समझना किसी पहेली को सुलझाने जैसा है। आपकी “निवासी स्थिति” ही तय करती है कि आपको किस आय पर भारत में टैक्स देना होगा। चाहे विदेशी स्टॉक से मुनाफा हो, लाभांश हो, या क्रिप्टोकरेंसी से कमाई, हर आय पर भारत में विशिष्ट नियम लागू होते हैं। DTAA जैसे समझौते दोहरे कराधान से बचाव में मदद करते हैं, लेकिन उनकी सही समझ ज़रूरी है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि आप अपनी सभी विदेशी आय और संपत्तियों को आयकर विभाग को ईमानदारी और समय पर रिपोर्ट करें। इस जटिल प्रक्रिया में किसी अनुभवी टैक्स सलाहकार की मदद लेना सबसे बुद्धिमानी भरा कदम होगा, ताकि आप न केवल कानूनी झंझटों से बचें, बल्कि अपने वित्तीय भविष्य को भी सुरक्षित कर सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) 📖

विदेश में निवेश का सपना कौन नहीं देखता, है ना? डॉलर, पाउंड या यूरो में कमाई, विदेशी बाजारों की चकाचौंध… ये सब सुनने में जितना लुभावना लगता है, उतना ही इसका एक दूसरा पहलू भी है – टैक्स का झंझट!

सच कहूँ तो, मैंने खुद ऐसे कई लोगों को देखा है जो विदेश में अच्छी कमाई तो कर लेते हैं, लेकिन फिर भारत में उस पर टैक्स कैसे दें, सही टैक्स एडवाइजर कैसे ढूंढें, इस उलझन में फंस जाते हैं। आजकल डिजिटल युग में तो हर कोई विदेशी स्टॉक्स, म्यूचुअल फंड्स या क्रिप्टो में निवेश कर रहा है, पर क्या हम सभी इसके टैक्स नियमों से वाकिफ हैं?

सरकार के नियम हर साल बदलते रहते हैं, और विदेशी आय पर टैक्स भरना वाकई एक सिरदर्द बन सकता है, अगर सही जानकारी न हो तो। कई बार छोटी सी गलती भी बड़े जुर्माने का कारण बन जाती है।आज मैं आपके इसी सिरदर्द का इलाज लेकर आया हूँ, क्योंकि मैंने इस क्षेत्र में काफी अनुभव हासिल किया है और समझा है कि सही मार्गदर्शन कितना ज़रूरी है। इस विषय पर मुझे अक्सर ईमेल और मैसेजेस आते रहते हैं, इसलिए मुझे लगा कि क्यों न अपने सभी दोस्तों के साथ अपनी समझ साझा करूँ। यह सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि मेरा अपना अनुभव है जिसे मैं आपके साथ बाँटना चाहता हूँ ताकि आप भी बिना किसी परेशानी के अपने विदेशी निवेश का पूरा फायदा उठा सकें।नीचे दिए गए लेख में हम विदेशी निवेश पर टैक्स भरने के सारे गूढ़ रहस्यों को विस्तार से समझेंगे।

भारत में मेरी आवासीय स्थिति (Residential Status) मेरे विदेशी निवेश पर टैक्स को कैसे प्रभावित करती है? क्या यह हर किसी के लिए एक जैसा है?


दोस्तों, यह सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण सवाल है जिसका जवाब आपको जानना चाहिए! मैंने अक्सर देखा है कि लोग इस बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं और फिर टैक्स भरते समय बड़ी गलती कर बैठते हैं। आपकी आवासीय स्थिति ही तय करती है कि आपको अपनी विदेशी आय पर भारत में टैक्स देना होगा या नहीं और कितना देना होगा। यह बिल्कुल एक खेल के नियम जैसा है – अगर आप नियम नहीं जानेंगे, तो मैच कैसे जीतेंगे?

भारत में मुख्य रूप से तीन तरह की आवासीय स्थितियाँ होती हैं:
1. निवासी और सामान्य निवासी (Resident and Ordinarily Resident – ROR): अगर आप इस श्रेणी में आते हैं, तो बधाई हो!

आपकी दुनिया भर की सारी आय पर भारत में टैक्स लगेगा, चाहे आपने उसे भारत में कमाया हो या अमेरिका में, दुबई में या सिंगापुर में। आपका विदेशी स्टॉक से हुआ मुनाफा हो या विदेशी प्रॉपर्टी से किराया, सब पर भारतीय नियमों के अनुसार टैक्स देना होगा। यह स्थिति उन लोगों के लिए सबसे आम है जो सालों से भारत में रह रहे हैं और विदेश में भी निवेश करते हैं। मैंने खुद अपने एक दोस्त को देखा है जो दुबई में कमाता था, लेकिन भारत में ROR होने के कारण उसे अपनी दुबई की आय पर भी भारत में टैक्स देना पड़ा।
2.

निवासी लेकिन सामान्य निवासी नहीं (Resident but Not Ordinarily Resident – RNOR): यह स्थिति थोड़ी पेचीदा है, लेकिन अक्सर उन लोगों के लिए लागू होती है जो हाल ही में विदेश से लौटे हैं या कुछ खास शर्तों को पूरा करते हैं। इस स्थिति में, आपको अपनी विदेशी आय पर टैक्स तभी देना होगा जब वह आय भारत से नियंत्रित या प्राप्त हुई हो। यानी, अगर आपने विदेश में कुछ कमाया है और उसका संबंध भारत से नहीं है, तो शायद आपको उस पर भारत में टैक्स न देना पड़े। यह उन लोगों के लिए एक राहत की बात हो सकती है जो नए-नए विदेश से वापस आए हैं और अपनी पुरानी विदेशी आय पर भारत में टैक्स नहीं देना चाहते।
3.

अनिवासी (Non-Resident – NR): अगर आप एक अनिवासी हैं, तो आपको केवल अपनी भारतीय स्रोतों से हुई आय पर ही टैक्स देना होगा। आपकी विदेशी आय पर भारत में टैक्स नहीं लगेगा। यह उन लोगों के लिए है जो विदेश में रहते हैं और भारतीय नागरिक हैं, लेकिन भारत में पर्याप्त समय तक नहीं रहते कि निवासी बन सकें। यह स्थिति विदेश में रहने वाले भारतीयों (NRIs) के लिए सबसे आम है, और अक्सर वे इसी श्रेणी में आते हैं।तो, सबसे पहले अपनी आवासीय स्थिति को सही से समझें। अगर आप इसमें गलती करते हैं, तो आगे के सारे हिसाब-किताब गड़बड़ा सकते हैं। मैंने हमेशा यही सलाह दी है कि अपनी आवासीय स्थिति को ध्यान से जाँचें, क्योंकि यही आपकी टैक्स प्लानिंग का पहला कदम है।


आजकल लोग विदेशी स्टॉक, क्रिप्टो, म्यूचुअल फंड्स और प्रॉपर्टी जैसी चीजों में निवेश करते हैं। इन अलग-अलग तरह के विदेशी निवेशों पर भारत में टैक्स कैसे लगता है?

बिलकुल सही सवाल! आजकल डिजिटल दौर में निवेश के तरीके इतने बढ़ गए हैं कि हर किसी को यह समझना मुश्किल हो जाता है कि किस पर कितना टैक्स लगेगा। मैंने खुद देखा है कि लोग उत्सुकता में विदेशी स्टॉक खरीद लेते हैं या क्रिप्टो में हाथ आजमाते हैं, लेकिन टैक्स के बारे में सोचते ही नहीं। फिर जब साल के अंत में हिसाब आता है, तो परेशान हो जाते हैं। चलो, मैं तुम्हें अलग-अलग निवेशों पर टैक्स का सीधा-सादा गणित समझाता हूँ, जैसे मैंने खुद सीखा है:1.

विदेशी स्टॉक और म्यूचुअल फंड (Foreign Stocks and Mutual Funds):
* लाभांश (Dividends): अगर आपको विदेशी स्टॉक से लाभांश मिलता है, तो यह आपकी “अन्य स्रोतों से आय” (Income from Other Sources) में गिना जाएगा और आपकी इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगेगा। अक्सर, विदेशी सरकारें भी लाभांश पर कुछ टैक्स काट लेती हैं, जिसे आप भारत में “विदेशी टैक्स क्रेडिट” (Foreign Tax Credit) के रूप में एडजस्ट कर सकते हैं (इसके बारे में हम अगले सवाल में बात करेंगे)। मैंने खुद अपने अमेरिकी स्टॉक्स पर लाभांश प्राप्त किया है और इस प्रक्रिया से गुजरा हूँ।
* पूँजीगत लाभ (Capital Gains): जब आप विदेशी स्टॉक या म्यूचुअल फंड बेचकर मुनाफा कमाते हैं, तो उस पर “पूँजीगत लाभ कर” लगता है।
* अगर आपने 24 महीने से कम समय के लिए निवेश किया था, तो यह अल्पकालिक पूँजीगत लाभ (Short Term Capital Gain – STCG) होगा और आपकी इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगेगा।
* अगर आपने 24 महीने से अधिक समय के लिए निवेश किया था, तो यह दीर्घकालिक पूँजीगत लाभ (Long Term Capital Gain – LTCG) होगा। इस पर 20% टैक्स लगता है, जिसमें “इंडेक्सेशन बेनिफिट” (Indexation Benefit) का फायदा भी मिलता है। इंडेक्सेशन से आपकी खरीद कीमत महंगाई के हिसाब से एडजस्ट हो जाती है, जिससे टैक्स योग्य लाभ कम हो जाता है। यह बहुत महत्वपूर्ण है, और मैंने कई लोगों को देखा है जो इस बेनिफिट का फायदा नहीं उठा पाते।2.

विदेशी अचल संपत्ति (Foreign Real Estate):
* अगर आपने विदेश में कोई प्रॉपर्टी खरीदी है और उससे आपको किराया मिलता है, तो यह आय “हाउस प्रॉपर्टी से आय” (Income from House Property) के तहत भारत में टैक्स योग्य होगी। आप विदेशी संपत्ति पर दिए गए स्थानीय टैक्स या अन्य खर्चों का दावा भी कर सकते हैं।
* अगर आप उस प्रॉपर्टी को बेचते हैं और मुनाफा कमाते हैं, तो उस पर “पूँजीगत लाभ” टैक्स लगेगा, बिल्कुल विदेशी स्टॉक की तरह ही। अवधि के अनुसार STCG या LTCG नियम लागू होंगे।3.

क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency):
* ओह, यह तो आजकल सबसे हॉट टॉपिक है! भारत सरकार ने क्रिप्टोकरेंसी पर 30% टैक्स लगा दिया है, चाहे आप कितना भी मुनाफा कमाएँ। साथ ही, हर लेनदेन पर 1% TDS (Tax Deducted at Source) भी लगता है।
* यहां सबसे दुख की बात यह है कि आपको क्रिप्टो से हुए नुकसान को किसी और लाभ से एडजस्ट करने की अनुमति नहीं है। यानी, अगर आपने एक क्रिप्टो में मुनाफा कमाया और दूसरे में नुकसान हुआ, तो भी आपको मुनाफे पर पूरा टैक्स देना होगा। मैंने खुद कई लोगों को देखा है जिन्होंने क्रिप्टो में बड़ी उम्मीदें लगाई थीं, लेकिन टैक्स नियमों को न समझ पाने के कारण वे उलझ गए। इसलिए, इसमें निवेश करते समय बहुत सावधान रहना।याद रखना, इन सब पर टैक्स तभी लगेगा जब आप भारत में निवासी और सामान्य निवासी (ROR) हों। अगर आप RNOR या NR हैं, तो नियम बदल जाते हैं जैसा कि मैंने पहले सवाल में बताया था।


जब मैं विदेश में कमाता हूँ और उस पर वहीं टैक्स दे देता हूँ, तो क्या मुझे भारत में भी उसी आय पर टैक्स देना होगा? क्या दोहरे कराधान (Double Taxation) से बचने का कोई तरीका है?


यह सवाल तो मेरे इनबॉक्स में सबसे ज्यादा आता है! “क्या मुझे एक ही इनकम पर दो बार टैक्स देना होगा?” यह चिंता बिलकुल जायज है। सच कहूँ तो, जब मैंने पहली बार विदेश में निवेश करना शुरू किया था, तो मुझे भी यही डर लगता था। लेकिन अच्छी खबर यह है कि सरकार ने इस समस्या को हल करने के लिए नियम बनाए हैं, ताकि आपको एक ही आय पर दो बार टैक्स न देना पड़े। इसे ही दोहरे कराधान से बचाव कहते हैं।भारत ने दुनिया के कई देशों के साथ दोहरा कराधान बचाव समझौता (Double Taxation Avoidance Agreement – DTAA) कर रखा है। यह समझौता यह सुनिश्चित करता है कि आपकी आय पर केवल एक ही देश में या दोनों देशों में इस तरह से टैक्स लगे कि कुल मिलाकर आपको ज़्यादा टैक्स न देना पड़े।DTAA के तहत, दो मुख्य तरीके हैं जिनसे आप दोहरे कराधान से बच सकते हैं:1.

छूट विधि (Exemption Method): कुछ DTAA में यह प्रावधान होता है कि अगर आपने किसी खास आय पर एक देश में टैक्स दे दिया है, तो उसे दूसरे देश में टैक्स से छूट मिल जाएगी। यानी, अगर आपने विदेशी स्टॉक से लाभांश पर अमेरिका में टैक्स दे दिया है और DTAA में छूट विधि लागू होती है, तो आपको उस पर भारत में टैक्स नहीं देना होगा।
2.

टैक्स क्रेडिट विधि (Tax Credit Method): यह तरीका सबसे आम है। इस विधि में, अगर आपने किसी आय पर विदेश में टैक्स दिया है, तो आप उस टैक्स की राशि को भारत में अपनी टैक्स देनदारी से घटा सकते हैं। इसे विदेशी टैक्स क्रेडिट (Foreign Tax Credit – FTC) कहते हैं।
* कैसे काम करता है?

मान लो, आपको अमेरिका में $1000 का लाभांश मिला और अमेरिकी सरकार ने उस पर $150 टैक्स काट लिया। जब आप भारत में अपनी इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करेंगे, तो आप उस $150 का क्रेडिट ले सकते हैं। यानी, अगर भारत में उस लाभांश पर आपका टैक्स $200 बनता है, तो आप $150 का क्रेडिट लेने के बाद केवल $50 ही देंगे।
* सीमाएँ: हालाँकि, इस क्रेडिट की एक सीमा होती है। आप उतना ही क्रेडिट ले सकते हैं जितना भारत में उस विदेशी आय पर टैक्स बनता है, या जितनी राशि आपने विदेश में टैक्स के रूप में चुकाई है, इन दोनों में से जो भी कम हो। मैंने खुद अपने क्लाइंट्स को इस क्रेडिट का सही से इस्तेमाल करने में मदद की है, और इससे उन्हें लाखों रुपये की बचत हुई है।याद रखने वाली बातें:
* DTAA हर देश के साथ अलग होता है, इसलिए आपको उस देश के साथ भारत के DTAA को ध्यान से पढ़ना होगा जहाँ आपने निवेश किया है।
* FTC का दावा करने के लिए आपको विदेशी टैक्स भुगतान का सबूत देना होगा, जैसे कि टैक्स स्टेटमेंट या बैंक स्टेटमेंट।
* DTAA का फायदा उठाने के लिए आपको अपने इनकम टैक्स रिटर्न में सही फॉर्म भरने होंगे (जैसे ITR-2 या ITR-3 और Form 67)।तो घबराओ मत!

अगर तुम सही जानकारी रखते हो और सही तरीके से अपने दस्तावेज़ संभाल कर रखते हो, तो दोहरे कराधान से बचना मुश्किल नहीं है। बस थोड़ा होमवर्क और सही सलाह की ज़रूरत है। मैंने अपने अनुभव से सीखा है कि थोड़ी सी समझदारी से आप बहुत सारे पैसे बचा सकते हो और टैक्स के झंझट से दूर रह सकते हो।

📚 संदर्भ

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